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सपा के लिए करो या मरो की स्थिति!

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2027 का विधानसभा चुनाव

रजत सिन्हा

लखनऊ। 2012 से 2017 तक प्रदेश की सत्ता में काबिज रही समाजवादी पार्टी ने पहली बार 2012 के चुनाव में ततकालीन मायावती सरकार को पटखनी देते हुए पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी । 2017 में पासा पलटा और बीजेपी ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई और समाजवादी पार्टी मात्र 44 सीटों पर सिमट कर रह गई । बात यहीं खत्म नहीं हुई, 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा एक बार दशकों बाद फिर साथ आए लेकिन कोई खासा कमाल नहीं कर पाए । गठबंधन का फ़ायदा सपा से ज़्यादा बीएसपी को मिला । 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा सरकार तो नहीं बना सकी,लेकिन अकेले दम पर अपनी सीटों की संख्या 44 से बढ़ाकर 111 तक पहुंचाने में कामयाब रही । सहयोगी दलों को जोड़ लिया जाए तो ये संख्या लगभग 150 के आस पास पहुँच जाती है ।

फिर आता है 2024 का लोकसभा चुनाव । जिसे सपा और कांग्रेस मिलकर लड़ती है और बीजेपी के जीत के रथ को रोक देती है । चुनाव में गठबंधन को लोकसभा की 37 सीटें हासिल होती हैं । केंद्र में एक बार फिर मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनती है , लेकिन कुछ दलों के समर्थन से । समाजवादी पार्टी संख्या की दृष्टि से लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है ।  

विधानसभा और लोकसभा चुनावों की सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी इस बार प्रदेश के विधानसभा चुनावों को करों या मरों के रूप में ले रही है । सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पीडीए बनाकर भाजपा को उसी राह पर चलने को मजबूर कर दिया है । कह सकते हैं कि सपा मुखिया आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर फूंक फूँककर क़दम रख रहे हैं । उन्हें पता है कि अगर पार्टी की इस बार सत्ता में वापसी नहीं हुई तो कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना बहुत टेढ़ी खीर साबित होगा ।

मुद्दों के अलावा सबसे ज़्यादा जरूरी है पार्टी प्रत्याशियों का चयन और इसके साथ ही गठबंधन में शामिल दलों को प्रयाप्त सीटें देकर उन्हें संतुष्ट रखना ।

पार्टी प्रत्याशियों के चयन को लेकर पार्टी नेतृत्व ने अभी से अपनी कवायद शुरू कर दी है । चयन के लिए दोहरी प्रक्रिया अपनाई जा रही है । एक निजी एजेंसी से सर्वे कराकर। जिसकी देखरेख एक रिट्यार्ड आईएएस अधिकारी कर रहे है । दूसरी प्रक्रिया स्थानीय नेताओं से संभावित उम्मीदवारों का फीडबैक लेकर ।

यूपी की 403 विधानसभा सीटों पर पार्टी ने अपने संभावित दावेदारों पर काम शुरू कर दिया है।

इस टीम ने उम्मीदवारों के चयन से जुड़ी एक रिपोर्ट तैयार कर ली है। इसमें सपा के सीटवार संभावित प्रत्याशियों के नाम हैं। इस रिपोर्ट में कई तरह के सवालों का जिक्र है। जैसे-क्या ये उम्मीदवार चुनाव जीत सकता है?

क्या ये उम्मीदवार जातिगत समीकरण पर फिट बैठता है?

क्या उम्मीदवार को क्षेत्र में लोग पसंद करते हैं?

क्या उम्मीदवार की छवि बेदाग है?

क्या उम्मीदवार का कोई क्रिमिनल बैकग्राउंड तो नहीं है?

क्या उम्मीदवार की अपने क्षेत्र के अलावा आसपास की सीटों पर भी दबदबा है?

सर्वे की मॉनिटरिंग खुद सपा प्रमुख कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस बार टिकट वितरण में सर्वे और फीडबैक को प्राथमिकता दी जाएगी। पार्टी उन्हीं चेहरों को मैदान में उतारेगी, जिनका अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार होगा। छवि बेदाग होगी और वो जिताऊ उम्मीदवार होंगे।

सपा का 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी की करीब 70 सीटों पर प्रदर्शन

कमजोर रहा था। इन सीटों पर सपा विशेष ध्यान दे रही है ।

2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद सपा के नेताओं ने माना कि टिकट वितरण में चूक हुई। भाजपा या अन्य दलों से आए नेताओं को तुरंत टिकट दिए जाने से पार्टी के पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी देखी गई थी।

आरोप लगे कि टिकट बांटने में जमीनी हकीकत या सर्वे के बजाय स्थानीय जिलाअध्यक्षों और बड़े नेताओं की व्यक्तिगत 'पैरवी' को तरजीह दी गई। कई जगहों पर गुटबाजी के आधार पर जिताऊ उम्मीदवार की अनदेखी की गई।

पार्टी की आंतरिक समीक्षा में सामने आया कि कई सीटों पर बहुत मामूली अंतर से हार हुई। क्योंकि उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर उतने लोकप्रिय नहीं थे। उनका बूथ मैनेजमेंट भी कमजोर था।

वही अगर सपा का कांग्रेस से गठबंधन होता है, जैसा कि पूर्वानुमान है तो कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का दबाव बना सकती है। ऐसे में सपा को कांग्रेस को भी सम्मान जनक सीटें देकर साधना होगा ।हालांकि, मुस्लिम बहुल सीटों पर खींचतान हो सकती है। जैसे कि 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिली था ।

इस बार विधानसभा चुनाव में

सपा सुप्रीमों के लिए सीट नहीं जीत महत्वपूर्ण है। उनके लिए उम्मीदवार की जीत अहम होगी। यानी जिसके चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा होगी, टिकट उसे ही मिलेगा। इसके लिए वह अपने करीबी या किसी कद्दावर नेता का भी टिकट काट सकते हैं। हालाँकि सपा मुखिया ने पार्टी की बैठक में पहले ही कह दिया है कि जिसको भी चुनाव लड़ना है,अगर वह पहले से संगठन के किसी पद पर है या किसी और पद पर है तो उसे इस्तीफा देना होगा । तभी पार्टी नेतृत्व उसके नाम पर विचार करेगा ।

सपा सुप्रीमो की प्रत्याशी चयन को लेकर अपनायी जा रही ये रणनीति क्या रंग लाएगी ये तो विधानसभा चुनाव परिणाम ही बतायेंगे,लेकिन एक बात तो तय है कि प्रत्याशी चयन को लेकर पार्टी नेतृत्व द्वारा पूर्व में रही खामियों को दूर करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी जाएगी ।

कभी भी जारी हो सकती सपा के 99 प्रत्याशियों की सूची*

प्रदेश की समाजवादी पार्टी अब पूरी तरह से विधानसभा के चुनावी मोड में नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों की पहली सूची कभी भी जारी हो सकती है। पार्टी हाईकमान ने सूची को फाइनल कर दिया है। पार्टी के जानकारों से मिली जानकारी के मुताबिक पहली जारी होने वाली सूची में 99 प्रत्याशियों के होने की संभावना जताई गई है। विश्वस्त सूत्रों की माने तो इस बार पार्टी ने कई सामान्य सीटों पर अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों पर दांव लगाया है। बताया जा रहा है कि राजधानी की मोहनलालगंज, मलिहाबाद और सरोजनीनगर विधानसभाओं में तीनों सीटों पर अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों को लड़ाए जाने की चर्चा है। सरोजनीनगर विधानसभा सीट सामान्य सीट है। इन सभी सीटों पर पासी समाज के प्रत्याशी उतारे जाने की चर्चा है।

 

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